Jai Bolo Beiman Ki (जय बोलो बेईमान की)
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झूठ और बेईमानी दोनों सिस्टर कन्सर्न हैं। इनका आपस में वैसा ही संबंध है, जैसा मियां जिया का पाक से, मुंह का नाक से और पोस्टमैन का डाक से। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही ख़तरे में पड़ जाता है। झूठ का बाजार गर्म देखकर काका भी ज़माने की नब्ज़ पहचान गए और गा उठे-जय बोलो बेईमान की। बस, हो गया एक और संकलन तैयार, जिसमें ऐसी कितनी ही कविताओं की है भरमार। स्थितियाँ एक से एक बीमार तेज़ नश्तर, तीखे प्रहार, कहीं-कहीं रस-रंग की फुहार। पाठक-श्रोता हों बलिहार !
- डा० गिरिराजशरण अग्रवाल
- डा० गिरिराजशरण अग्रवाल






















