Mashhoor Shayaron kee Pratinidhi Shayari Muhammad Iqbal
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आता है याद मुझको गुजरा हुआ ज़माना वो बाग की बहारें वो सब का चहचहाना आजादियाँ कहाँ वो अब अपने घोंसले की अपनी खुशी से आना अपनी खुशी से जाना इकबाल युग निर्माता शायर थे। उनकी शायरी एक विचार के खास निज़ाम से रोशनी ग्रहण करती है। इक़बाल आदमी की महानता के अलमबरदार थे और वो किसी बख्शी हुई जन्नत की बजाय अपने खून-ए-जिगर से स्वयं अपनी जन्नत बनाने की प्रक्रिया को अधिक संभावित और अधिक जीवनदायिनी समझते थे। इसके लिए उसका उपाय तजवीज करते हुए उन्होंने कहा था, "पूरब के राष्ट्रों को ये महसूस कर लेना चाहिए कि ज...






















